माँ की तीसरी सीढ़ी
माँ छत की सीढ़ी तीसरे पायदान पर छोड़कर बैठ जाती हैं। और कहती हैं — कुछ नहीं हुआ।
वो थकी नहीं हैं। वो घुटने को एक पल का आराम दे रही हैं — और चाहती हैं कि मैं देख न लूँ।
मेरी माँ सुधा शर्मा, उम्र 52, इंदौर।
छत पर कपड़े सुखाने का काम आज भी वही करती हैं। पानी का स्टील गिलास साथ लेकर चढ़ती हैं, तीसरे पायदान पर गिलास रखकर ख़ुद भी बैठ जाती हैं, और दुपट्टे से फ़ोन निकालकर स्क्रीन ऐसे देखती हैं जैसे कोई ज़रूरी message आया हो।
माँ के फ़ोन पर message आते ही नहीं। वो रुकना छिपाने के लिए है।
रसोई में जाते वक़्त उनका बायाँ हाथ दीवार पर टिका — जैसे पहले भी टिकता था, और मैंने देखा नहीं था।
माँ के लिए ऑर्डर कीजिए →₹899 में 2 पीस · MRP ₹1,199 · CODशिकायत मत सुनिए। ये देखिए कि उन्होंने क्या करना छोड़ दिया है
माँ ने मंदिर जाना छोड़ दिया था। कोई ऐलान नहीं हुआ — पहले “तबीयत ठीक नहीं”, फिर “तुम लोग हो आओ”, फिर बात ही होनी बंद। वहाँ सीढ़ियाँ हैं, और अंदर ज़मीन पर बैठना पड़ता है।
पालथी छूटी। ज़मीन पर पूजा छूटी, अब स्टूल पर। मंडी तक पैदल जाना छूटा। शिकायत एक बार भी नहीं आई।
बाद में मैंने पढ़ा। ये हमारे घर की अकेली कहानी नहीं है।
बाहर की studies से लिए अंदाज़े — हमारे product के result नहीं।
दूसरा आँकड़ा देर तक चुभता रहा। दिल्ली में औरतों पर हुई एक study का है — घुटने घिस चुके थे, फिर भी आधे से ज़्यादा ने किसी को दिखाया तक नहीं। माँ भी उन्हीं में से थीं।
दराज़ में बाम था। डॉक्टर का नंबर नहीं था।
दराज़ में वही मिलेगा — आधी दबी ट्यूब, तेल की शीशी, और एक क्रेप बैंडेज जो कभी ठीक से बँधा ही नहीं। कोई डॉक्टर नहीं, कोई जाँच नहीं।
“माँ, एक बार दिखा आते हैं” — जवाब हमेशा एक ही मिला।
ये उनका डर था, सलाह नहीं। दिखा लेने से ऑपरेशन तय नहीं हो जाता — पर उनके मन में डॉक्टर का दरवाज़ा सीधे लाखों वाले ऑपरेशन पर खुलता था, इसलिए खोला ही नहीं। दिखा तो लेना ही चाहिए था।
मैं भी कोई इलाज नहीं ढूँढ रही थी। मुझे इतना चाहिए था कि चलते वक़्त सहारा रहे, और माँ चलना बंद न करें।
₹899 में 2 knee support मँगवाइए →Buy 1 Get 1 Free · ₹300 की बचत · CODमैंने बिना पूछे ऑर्डर कर दिया। और डाँट खाई।
एक रात फ़ोन पर ये silicon knee support दिखा। COD था — पैसा तब, जब चीज़ हाथ में हो। यही बात थी जिसने हिम्मत दी।
डाँट पड़ी। फिर मैंने कहा — “एक बार पहनकर देख लो, नहीं जँचा तो रख देना।” माँ ने मुँह बनाया, और पहन लिया।
डिब्बे में दो थे। माँ दोनों घुटनों की शिकायत करती हैं — बायाँ ज़्यादा, दायाँ कम, लेकिन दोनों।
अब सच वाली बात। माँ का दर्द ख़त्म नहीं हुआ, और मैं ये नहीं लिखूँगी कि हुआ। जिस घुटने को पचास साल घिसे हैं, वो एक belt से नया नहीं हो जाता।
जो बदला वो इतना है: घुटने के चारों तरफ़ एक पकड़ बनी रहती है, और उतरते वक़्त घुटना ख़ाली-ख़ाली नहीं लगता*। माँ के शब्दों में — “बँधा-बँधा लगता है, तो हिम्मत आ जाती है”*।
*Result हर इंसान का अलग-अलग होता है — ये सहारा है, दवा या इलाज नहीं।
अब सीधे product की बात
ये एक knee cap / knee belt है। आगे नरम gel की परत, जो चपनी पर पड़ने वाला दबाव सोख लेती है। चपनी के चारों तरफ़ silicon की रिंग, जो 360° से घेरकर सहारा और हल्का कसाव देती है — चलते वक़्त डगमगाने का एहसास कम होता है*। और दो पट्टियाँ, जो आप ख़ुद कसती हैं ताकि चीज़ सरके नहीं; सरकने की शिकायत इस category में आम है। कपड़ा हवादार है और पसीना सोखता है। जोड़ की दिक़्क़त में थोड़ा आराम लग सकता है*।
*Result हर इंसान का अलग-अलग होता है — ये सहारा है, दवा या इलाज नहीं।
ये ज़रूर पढ़िए — ये दवा नहीं है।
अगर घुटने में तेज़ दर्द है, सूजन है, चोट लगी है, घुटना लॉक हो जाता है, या पहले कभी surgery हुई है — तो पहले डॉक्टर या physiotherapist को दिखाइए। ये सामान उनकी जगह नहीं ले सकता।
लगातार पहनकर मत रखिए। काम और चलने-फिरने के वक़्त पहनिए, बीच-बीच में उतारिए और घुटने को खुली हवा लगने दीजिए। कसाव से सुन्नपन, झनझनाहट या पैर ठंडा पड़ने जैसा लगे — तुरंत उतार दीजिए और ढीला करके पहनिए। Diabetes या ख़ून के बहाव की दिक़्क़त हो तो डॉक्टर से पूछकर ही पहनिए।
एक पैक में 2 knee support — दोनों घुटनों के लिए · पूरे भारत में COD
वो सवाल, जो मैंने ख़ुद पूछे थे
क्या इससे घुटने का घिसना ठीक हो जाएगा?
माँ को size आएगा या नहीं?
सस्ती कैप तो बाज़ार में पड़ी हैं, फिर ये क्यों?
पेमेंट, डिलीवरी और वापसी की शर्तें क्या हैं?
आख़िरी बात — उस बेटी की तरफ़ से जिसे देर से समझ आया
फिर एक इतवार माँ ने कहा — “चल, सब्ज़ी लेने चलते हैं।” मैं चुपचाप चप्पल पहनकर साथ हो ली, क्योंकि डर था कि बोली तो इरादा बदल देंगी।
और मंदिर? एक शाम वो चप्पल पहनकर अकेले निकल गईं, बिना किसी से कहे। लौटीं तो सिर्फ़ इतना बोलीं — “प्रसाद रखा है।” अंदर ज़मीन पर बैठना अब भी नहीं होता, वो बाहर वाली चौकी पर ही बैठकर आईं। सीढ़ियाँ कैसी लगीं, ये मैंने नहीं पूछा और उन्होंने नहीं बताया। बस इतना कि वो गईं।
उन्होंने आज तक नहीं कहा कि “अच्छा किया जो ले आई” — कहेंगी भी नहीं। लेकिन वो चीज़ अब दराज़ में नहीं, दरवाज़े के पास वाली खूँटी पर टँगी रहती है।
आपके घर में भी कोई सीढ़ी बीच में छोड़कर बैठ जाता होगा। वो आपसे नहीं कहेगा। ये आपको ख़ुद देखना पड़ेगा, और शायद पूछे बिना ही मँगवाना पड़ेगा। डाँट पड़ेगी — पड़ने दीजिए।
माँ के लिए अभी ऑर्डर कीजिए →₹899 में 2 पीस · पैसा डिलीवरी पर · MRP ₹1,199ऊपर दिए भाव और आँकड़े बाहर की रिपोर्टों से लिए अंदाज़े हैं। तस्वीरें समझाने के लिए हैं।